पीपल

पीपल
राज्य वृक्ष
हरियाणा शासन
बिहार सरकार
अंग्रेजी नाम:टीम : Ficus religiosa L.
प्राप्ति स्थान एवं वितरण : लगभग सभी जिलों में।
पुष्पन, फलनकाल : अप्रैल से सितम्बर तक फूल एवं फल आते हैं।
बीज संग्रहण: अप्रैल से सितंबर
उपयोगी भाग : पत्ती, छाल
उपयोग :
इसका प्रयोग उदरविकार, श्वासविकार, पुराने फोड़ों, सर्पदंश, मधुमेह एवं स्त्रीरोग में करते हैं।
उपलब्धता : सामान्य।
पीपल (संस्कृत: अश्वत्थ)
भारत, नेपाल, श्री लंका, चीन और इंडोनेशिया में पाया जाने वाला बरगद, या गूलर की जाति का एक विशालकाय वृक्ष है जिसे भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा अनेक पर्वों पर इसकी पूजा की जाती है। बरगद और गूलर वृक्ष की भाँति इसके पुष्प भी गुप्त रहते हैं अतः इसे ‘गुह्यपुष्पक’ भी कहा जाता है। अन्य क्षीरी (दूध वाले) वृक्षों की तरह पीपल भी दीर्घायु होता है।[1] इसके फल बरगद-गूलर की भांति बीजों से भरे तथा आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। यह रात मे ऑक्सीजन प्रदान नही करता। पीपल की छाया बरगद से कम होती है, फिर भी इसके पत्ते अधिक सुन्दर, कोमल और चंचल होते हैं। वसंत ऋतु में इस पर धानी रंग की नयी कोंपलें आने लगती है। बाद में, वह हरी और फिर गहरी हरी हो जाती हैं। पीपल के पत्ते जानवरों को चारे के रूप में खिलाये जाते हैं, विशेष रूप से हाथियों के लिए इन्हें उत्तम चारा माना जाता है। पीपल की लकड़ी ईंधन के काम आती है किंतु यह किसी इमारती काम या फर्नीचर के लिए अनुकूल नहीं होती। स्वास्थ्य के लिए पीपल को अति उपयोगी माना गया है। पीलिया, रतौंधी, मलेरिया, खाँसी और दमा तथा सर्दी और सिर दर्द में पीपल की टहनी, लकड़ी, पत्तियों, कोपलों और सीकों का प्रयोग का उल्लेख मिलता है।
भारतीय संस्कृति में पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि अश्वत्थ (पीपल) के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं।[क] पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है। भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ।[ख] स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।[ग] पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं। पीपल वृक्ष की प्रार्थना के लिए अश्वत्थस्तोत्र में पीपल की प्रार्थना का मंत्र भी दिया गया है। [घ] प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज में अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है। अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है। श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। यज्ञ में प्रयुक्त किए जाने वाले ‘उपभृत पात्र’ (दूर्वी, स्त्रुआ आदि) पीपल-काष्ट से ही बनाए जाते हैं। पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि प्रज्वलित किया करते थे।[3] ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों में निहित जीवनदायी गुणों का सेवन कर उम्र के अंतिम पडाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।

डा राम पाटीदार
कृषिभूषण
पर्यावरणविद्

 

पीपल
भारतीय जनजीवनमें वनस्पतियों, वृक्षों आदिमें भी देवत्वकी अवधारणा की गयी है। वृक्षोंमें पीपल, गूलर, बरगद, पाकड़ और आमको पंचवट माना गया है। इनमें भी धार्मिक आस्थाकी दृष्टिसे पीपलका स्थान सर्वोपरि है।

कल्पवृक्षकी तरह पीपल भी अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है। पीपल पवित्र वृक्ष है, जिसमें करोड़ों देवताओं एवं पितरोंका निवास है।

श्रीमद्भगवद्‌गीताके दसवें अध्याय के २६वें श्लोकमें भगवान् श्रीकृष्णने स्पष्ट घोषणा की थी कि अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः अर्थात् मैं वृक्षोंमें पीपल तथा देवर्षियोंमें नारद हूँ। स्कन्दपुराणके अनुसार भी पीपलके मूलमें ब्रह्माजी, मध्यमें विष्णुजी एवं अग्रभागमें शिवजी साक्षात् रूपमें विराजमान हैं।*

अनादि समयसे पीपलकी पूजा होती आयी है। कोई मृत्युको प्राप्त होता है तो उसकी आत्माकी शान्तिके लिये उसके निमित्त पीपलवृक्षके मूलमें जल चढ़ाते हैं।

अशौचकी पूर्ण निवृत्ति भी देववृक्ष पीपलके स्पर्शसे मानी गयी है। आयुर्वेदमें बहुत-से रोगोंका नाश करनेकी शक्ति पीपलवृक्षमें बतायी गयी है। इस संसारको भी अश्वत्थ कहा गया है। संसाररूपी पीपलका वृक्ष भी तत्त्वतः परमात्मरूप होनेसे पूजनीय है। इस संसाररूप पीपलवृक्षकी पूजा यही है कि इससे सुख लेनेकी इच्छाका त्याग करके केवल इसकी सेवा करना। अतः अश्वत्थवृक्ष हमें संसारकी क्षणभंगुरता तथा सर्वत्र परमात्म प्रभुकी व्यापकताका आध्यात्मिक सन्देश प्रदान करता

है। पीपल, आँवला और तुलसी- इनकी भगवद्भावपूर्वक पूजा करनेसे उसे भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है। अश्वत्थवृक्षके आरोपणकी बड़ी महिमा है, ऐसे व्यक्तिकी वंशपरम्पराका उच्छेद नहीं होता। समस्त ऐश्वर्य एवं दीर्घायुकी प्राप्ति होती है और पितृगण नरकसे छूटकर मोक्ष प्राप्त करते हैं-

अश्वत्थः स्थापितो येन तत्कुलं स्थापितं ततः ।

धनायुषां समृद्धिस्तु पितॄन् क्लेशात् समुद्धरेत् ॥

अश्वत्थकी पूजा एवं स्पर्श प्रायः शनिवारको ही विशेष रूपसे किया जाता है। अश्वत्थकी पूजाका नियम लेनेके लिये पहले दिन शुक्रवारको प्रातः शुभ मुहूर्तमें पीपलवृक्षके पास जाकर उसकी जड़में सुपारी, हल्दी-कुंकुम और चावल चढ़ाकर दोनों हाथ जोड़कर कहे कि हे कल्पवृक्ष, पितृदेवता! मैं कलसे अपने सुख, शांति, समृद्धिके लिये आपकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा। इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान करें। इस प्रकार उनकी आज्ञाप्राप्तिकी भावनाकर शनिवारको प्रातःकाल तेलकी आड़ी बत्तीवाला दीपक जलाये। ताँबेके लोटेमें जल लेकर पीपलवृक्षके पास जाकर दीपक रखकर पीपलकी जड़में जल चढ़ाये। पाँच बार परिक्रमा करे। परिक्रमा करते हुए निम्न मन्त्र बोले-

अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन। इष्टकामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ॥ आयुः प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम् । देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥

(अश्वत्थस्तोत्रम् १८-१९)

* मूले विष्णुः स्थितो नित्यं स्कन्धे केशव एव च। नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान् हरिः ॥

फलेऽच्युतो न संदेहः सर्वदेवैः समन्वितः ।

स एव विष्णुर्दुम एव मूर्ती महात्मभिः सेवितपुण्यमूलः। यत्संश्रयः पापसहस्रहन्ता भवेन्नृणां कामदुधो गुणाढ्धः ॥

(स्कन्दपुराण, नागर० २४७/४१-४२, ४४)

अर्थात् अश्वत्थ वृक्षके मूलमें विष्णु, तनेमें केशव, शाखाओंमें नारायण, पत्तोंमें भगवान् श्रीहरि और फलोंमें सब देवताओंसे युक्त अच्युत सदा निवास करते हैं। यह वृक्ष मूर्तिमान् श्रीविष्णुस्वरूप है। महात्मा पुरुष इस वृक्षके पुण्यमय मूलकी सेवा करते हैं। इसका आश्रय करना मनुष्योंके सहस्त्रों पापोंका नाशक तथा सभी अभीष्टोंका साधक है।

 

 

पीपल-वृक्षका वैज्ञानिक महत्त्व
आज विज्ञान इस निष्कर्षपर पहुँचा है कि दुनियाका एकमात्र पीपल ही ऐसा वृक्ष है, जो दिन-रात चौबीसों घण्टे ऑक्सीजनका उत्सर्जन करता है तथा कार्बन डाई ऑक्साइडको ग्रहण करता है। इससे बड़ा मानवोपकारी कौन हो सकता है?

पीपलके पेड़का मूल (Origin) भारत-भूमि है। यह पेड़ चिरायु है और कई हजार सालतक रहता है। आज मुम्बईमें एक पेड़ ३००० वर्षसे अधिक पुराना है। श्रीलंकामें एक पेड़ २८८ ईसा पूर्व (B.C.) का है, इसे भारतसे ले जाया गया था। वह पेड़ आज सबसे पुराना है और उसे पैतृक वृक्ष कहकर उसकी पूजा की जाती है। समुद्रसे ५००० फीट (१५२४ मीटर) की ऊँचाईतक पीपलके पेड़को सहज रूपसे लगाया जा सकता है।

भारतसे यह पेड़ ले जाकर संसारके बहुत सारे देशोंमें लगाया गया है, जैसे- यूनाइटेड स्टेट्स (United States), साउथ केलीफोर्निया (Southern California), फ्लोरीडा (Florida), हवाई (Hawaii), इजराइल (Israel) और संसारके कई ट्रॉपिकल (Tropical) क्षेत्र। भगवान् बुद्धने पीपलके पेड़के नीचे तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। बौद्ध धर्मके प्रायः सभी मन्दिरोंमें पीपलका वृक्ष पाया जाता है।

भगवान् कृष्णने गीतामें पीपलको अपनी विभूति

कहा है- ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्।’ (१०।२६) अर्थात् वृक्षोंमें मैं पीपलका वृक्ष हूँ। हिन्दुओंमें पीपलको जलसे सिंचित करना एक धार्मिक कर्म माना जाता है और यह मरणाशौचकी निवृत्तिकर पवित्रता प्रदान करता है।

पीपलका पेड़ कई प्रकारकी औषधियोंके निर्माणमें काम आता है। इस पेड़के गुणोंसे प्रभावित होकर सन्

१९८७ ई० में भारत सरकारने इसपर एक विशेष डाक टिकट जारी किया था।

आयुर्वेदके अनुसार पीपल मधुर, कषाय और शीतल है। इसके अनुपान-भेदपूर्वक सेवनसे कफ, पित्त और दाह नष्ट होते हैं। इसके फलके सेवनसे रक्त-पित्त, विष, दाह, शोथ एवं अरुचि आदि दूर होते हैं। इस वृक्षकी कोमल छाल एवं पत्तेकी कली पुरातन प्रमेह रोगमें अत्यन्त लाभप्रद है। पीपलके फलका चूर्ण अत्यन्त क्षुधावर्धक है। पीपलके पत्तेकी भस्मका शहदके साथ सेवन कफ रोगोंमें लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त अन्य कई व्याधियोंके उपचारमें भी पीपल वृक्षके महत्त्वका संकेत आयुर्वेदमें दृष्टिगोचर होता है।

इसको ध्यानमें रखकर हमें अधिक-से-अधिक पीपलके वृक्ष लगाने चाहिये, जिससे हम कार्बन डाई ऑक्साइडके दुष्परिणामोंसे सुरक्षित रह सकें और जीवनदायिनी ऑक्सीजनसे स्वास्थ्य लाभ एवं दीर्घ आयु प्राप्त कर सकें तथा पर्यावरणको सुधारनेमें सहयोगी बनें।

अश्वत्थस्तोत्र (२९-३०) में कहा गया है कि पीपलके वृक्षको बिना धार्मिक प्रयोजनके काटना अपने पितरोंको काट देनेके समान है। ऐसा करनेसे वंशकी हानि होती है। यज्ञादि पवित्र कार्योंके उद्देश्यसे इसकी लकड़ी काटनेसे कोई दोष न होकर अक्षय स्वर्गको प्राप्ति होती है। पीपल सर्वदेवमय वृक्ष है, अतः इसका पूजन करनेसे समस्त देवता पूजित हो जाते हैं-

छिन्नो येन वृथाश्वत्थश्छेदिताः पितृदेवताः ।

यज्ञार्थं छेदितेऽश्वत्थे हाक्षयं स्वर्गमाप्नुयात् ॥

अश्वत्थः पूजितो यत्र पूजिताः सर्वदेवताः ॥
(मेजर श्रीमनोहरलालजी)

 

युगप्रतीक वृक्ष
आदिकालसे ही चार युगोंका प्रमाण मिलता है-सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। सतयुगमें केवल ध्यानमात्रसे ही जीवमात्रका कल्याण और मुक्ति हो जाया करती थी। त्रेतायुगमें विभिन्न प्रकारके यज्ञ करके मानवमात्रका कल्याण होता था; क्योंकि भगवान्‌को समर्पित करनेसे कर्म नष्ट नहीं होते और उनका अच्छा परिणाम शीघ्र ही प्राप्त हो जाया करता है। द्वापरयुगमें भगवान्‌के चरणोंकी उपासना और साकार ब्रह्मकी उपासना तथा श्रृंगारकी अधिक प्रधानता थी। इसीसे लोगोंकी मुक्ति हो जाया करती थी। अतः श्रीकृष्णका जन्म और लीलाएँ इसीका प्रतीक हैं। इसके अतिरिक्त और कोई भी सरलतम उपाय जीवोंके सुखका नहीं था।

कलियुगमें उक्त सभी क्रियाएँ कठिन थीं। न तो ध्यान ही हो सकता था। आगे यज्ञ और हवनकी क्रियाएँ भी कठिन होंगी; क्योंकि मानवकी आय सीमित तथा तेजी अधिक हो जायगी। कलियुगमें मानवके पास पूजनका भी अधिक समय नहीं होगा; क्योंकि मनुष्य अपना धार्मिक मार्ग अलग ही निर्मित कर लेंगे। अतः ऐसा लगता है कि गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीको भविष्यका ज्ञान पहले ही हो गया था, तभी उन्होंने लिख दिया कि केवल राम नामका गुणगान और किसी-न-किसी प्रकारका दान मानवका कल्याण कर सकेगा। काकभुशुण्डिकी चर्यामें ये चारों युगधर्म समाविष्ट हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार गोस्वामीजीने किया है।

जब गरुड़जी काकभुशुण्डिके आश्रमपर गये, तब उन्होंने देखा कि उनके आश्रममें चार वृक्ष लगे हुए हैं। जब शंकरजीने हंसका रूप धारण करके काकभुशुण्डिकी कथाका श्रवण किया, उस समय वे चार वृक्ष इस प्रकारके थे-

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला ॥ उस आश्रमपर निवास करनेवाले काकभुशुण्डिजी

चारों प्रकारके धर्मोंका आचरण किया करते थे।

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई ॥ यह सतयुगका प्रतीक था, जो केवल ध्यानका ही प्रतीक था। आज भी यह बात सत्य सिद्ध हुई है कि पीपल प्रत्येक समय प्राणवायु छोड़ता है। अतः उसके

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नीचे ध्यान मुद्रामें ही बैठना चाहिये। यही क्रिया सतयुगमें की जाती थी। पाकड़का वृक्ष यज्ञ और हवनके लिये उत्तम होता है; क्योंकि उसकी छाया सघन और विस्तृत होती है। सम्भवतः त्रेतायुगमें इसी प्रकार क्रिया की जाती रही होगी।

आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा ।।

द्वापरमें श्रृंगार और मूर्तिपूजाका ही विशेष महत्त्व रहा होगा, जिसका प्रमाण आज भी प्राप्त होता है। अतः श्रृंगार और पूजनके निमित्त काकभुशुण्डिजीने आम्रको चुना था।

कलियुगमें केवल गुण-कीर्तन और कथा-वार्ता ही शेष रहेगी। अतः काकजी भी वटवृक्षके नीचे बैठकर विभिन्न पक्षियोंको कथा सुनाया करते थे। कथाके लिये बैठनेकी घनी और विस्तृत छाया तथा प्रसादवितरणहेतु पत्र दोनों ही बरगदमें उपलब्ध हैं। अतः कथावार्ता वटके नीचे ही उत्तम रहती है। यह कलियुगका प्रतीक है।

सतयुगका प्रतीक वृक्ष पीपल

त्रेतायुगका प्रतीक वृक्ष पाकड़

द्वापरयुगका प्रतीक वृक्ष आम

कलियुगका प्रतीक वृक्ष वट

इस प्रकारसे चारों युगोंका आचरण काकभुशुण्डिजीके द्वारा उनके आश्रममें स्थित चारों वृक्षोंके नीचे किया जाता था, वे वृक्ष आज भी उपस्थित हैं। पंचपल्लवमें वे ही पूज्य माने जाते हैं। अर्थात् पीपल, पाकड़, बरगद, आम और गूलर और कहीं-कहीं जामुनका पत्ता भी लिया जाता है। इस प्रकार कलियुगमें यह सबसे बड़ा गुण है कि श्रवण-कीर्तनसे ही जीवोंको सुख और शक्ति प्रतीत होती है।

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग।

जो गति होड़ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥

कलियुगमें चारों वृक्ष विद्यमान हैं, जो चारों युगोंकी ओर संकेत करते हैं। संक्षेपमें उनका वर्णन इस प्रकारसे है- सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग, ध्यान यज्ञ पूजन भजन, पीपल पाकड़ आम्र बरगद।

इस प्रकारसे गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने चारों वृक्षोंका वर्णन चारों युगोंके गुण और धर्मके अनुसार उन्हींका प्रतीक मानकर किया है, जो आज भी अनुशीलनीय है।शास्त्र मत है कि पीपल को बिना किसी प्रयोजनके काटना अपने पितरोंको काटनेके समान महापाप है। ऐसा करनेसे वंशकी हानि होती है। नित्य पीपलकी तीन बार परिक्रमा करके उसके मूलमें जल चढ़ानेसे दुःख, दुर्भाग्य एवं दरिद्रताका निवारण होता है। इस देववृक्षके दर्शन, नमन और श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन पूजन करनेसे सुख समृद्धि और दीर्घ आयु मिलती है।

प्रति शनिवारको पीपलका स्पर्श, पूजन और सात परिक्रमा करनेके उपरान्त सरसोंके तेलके दीपकका दान करनेसे शनिके कोपका शीघ्र शमन होता है। शनिदेवकी स्तुतिमें उनका स्तवन ‘पिप्पलाश्रयसंस्थिताय नमः’-मन्त्रद्वारा किया जाता है, इससे शनिदेवका पीपलके आश्रयमें रहनेका तथ्य स्वतः प्रमाणित होता है।

शनिवासरीय अमावास्याको पीपलके पूजनका विशेष महत्त्व माना जाता है। इस दिनके विशेष ग्रहयोगमें पीपलके वृक्षका सविधि पूजन एवं सात परिक्रमा करनेके पश्चात् पश्चिम दिशाकी ओर मुँह करके काले तिलसे युक्त सरसोंके तेलका दीपक जलाकर छायादान करनेसे शनिग्रहसम्बन्धी पीड़ाका नाश होता है।

अनुराधा नक्षत्रयुक्ता शनिवासरीय अमावास्यामें इस वृक्षका विधिवत् पूजन करनेसे शनिग्रहके प्रकोपसे मुक्ति मिलती है। इसमें श्राद्ध करनेसे पितृदोष शान्त होता है।

अमावास्यान्त श्रावणमासमें पीपलके नीचे स्थित हनुमान्जीकी शनिवारके दिन अर्चना करनेसे बड़े-से-बड़ा संकट दूर हो जाता है। स्मरणीय है कि पीपलको ब्रह्मस्थान भी माना जाता है।

इतना ही नहीं, पीपलका वृक्ष वातावरणके परिष्कार एवं परिमार्जनमें महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है। यह वृक्ष अन्य वृक्षोंकी अपेक्षा वातावरणमें ऑक्सीजनकी अधिक-से-अधिक मात्रामें अभिवृद्धि करता है। यह प्रदूषित वायुको स्वच्छ करता है और आस-पासके वातावरणमें सात्त्विकताकी भी वृद्धि करता है। इसके वृक्षराज पीपल
संसर्गमें आते ही तन-मन स्वतः हर्षित और पुलकित हो जाता है। यही कारण है कि इस वृक्षके नीचे ध्यान एवं मन्त्रजपका विशेष महत्त्व माना जाता है।

श्रीमद्भागवतमहापुराण (११।३०। २७) के अनुसार द्वापरयुगमें परमधाम जानेके पूर्व योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण इस दिव्य एवं पवित्रतम वृक्षके नीचे ही बैठकर ध्यानावस्थित हुए थे।

उपनिषदोंमें वर्णित है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अश्वत्थ वृक्षरूप है, जो सदासे है। इसका मूल पुरुषोत्तम ऊपर स्थित है और इसकी शाखाएँ नीचेकी ओर हैं-‘ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।।’

(कठो० २।३।१)

‘ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।’

(गीता १५।१)

कलियुगमें भगवान् गौतम बुद्धको सम्बोधिकी महाप्राप्ति बोधगयामें पीपलवृक्षके नीचे ही हुई थी। इस कारण इस वृक्षको बोधिवृक्ष भी कहा जाता है।

पीपलका धार्मिक महत्त्वके साथ-साथ आयुर्वेदिक महत्त्व सर्वविदित है। यह वृक्ष स्थूल वातावरणके साथ ही सूक्ष्म वातावरणको भी प्रभावित करता है। इसका यह प्रभाव मात्र शरीर और मनतक ही सीमित नहीं है, वरन् यह हमारे भावजगत्‌को भी आलोडित और आन्दोलित करता है। इस संदर्भमें वैज्ञानिक प्रयोग और अनुसन्धान भी हो रहे हैं।

पीपलकी इन समस्त विशेषताओंको ध्यानमें रखकर ही हमारे ऋषि-मुनियोंने इसकी बहुमुखी उपयोगितापर बल दिया है। सर्वपापनाशक यह वृक्षराज अपने उपासककी मनोकामना अवश्य पूर्ण करता है। पीपलके इन दिव्य गुणोंसे ही उसे पृथ्वीपर कल्पवृक्षका स्थान मिला है।

अतः इसका आरोपण करके इसे संरक्षण प्रदान करना चाहिये। इस वृक्षको लगाकर हम भी पुण्यके भागी बनें और हरीतिमा संवर्धनमें सहयोगी बनें।
(लेखक :श्रीअम्बिकाप्रसादजी मिश्र)

 

 

वृक्षराज पीपल
‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’ अर्थात् समस्त वृक्षोंमें मैं पीपलका वृक्ष हूँ। गीताके महान् गायक भगवान् श्रीकृष्णकी यह उक्ति पीपलके महत्त्वको रेखांकित करती है। पीपल वानस्पतिक जगत्‌में सर्वश्रेष्ठ है। इसी कारण स्वयं भगवान्ने इसे अपनी विभूति बताया है और इसके देवत्व और दिव्यत्वकी उद्घोषणा की है।

निःसन्देह पीपल देववृक्ष है, जिसके सात्त्विक प्रभावके स्पर्शसे अन्तश्चेतना पुलकित होती है। पीपल सदासे ही भारतीय जनजीवनमें विशेषरूपसे पूजनीय रहा है।

शास्त्रकारोंने पीपलको प्रत्यक्ष देवकी संज्ञा दी है। स्कन्दपुराणमें उल्लेख है कि अश्वत्थ (पीपल) के मूलमें विष्णु, तनेमें केशव, शाखाओंमें नारायण, पत्तोंमें श्रीहरि और फलोंमें सभी देवताओंके साथ श्रीअच्युत सदा निवास करते हैं। यह वृक्ष वस्तुतः भगवान् विष्णुका मूर्तिमान् स्वरूप है। इसका आश्रय मनुष्यके सभी पाप तापका शमन करता है। यह सभी अभीष्टोंका साधक है। इसी कारण धर्मग्रन्थोंमें कहा गया है-

‘अश्वत्थः पूजितो यत्र पूजिताः सर्वदेवताः ।।’

(अश्वत्थस्तोत्र ३०)

पीपलकी सविधि पूजा करनेसे समस्त देवता

स्वयमेव पूजित हो जाते हैं।

‘अश्वत्थस्तोत्र’ (१८-१९) में पीपलकी प्रार्थनाके लिये निम्न मन्त्र दिया गया है-

अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन।

इष्टकामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ॥ आयुः प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम् ।

देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥

उपर्युक्त मन्त्रका सविधि पाठ या जप करनेसे शत्रुओंका नाश होता है और सौभाग्य, सम्पदा, धन एवं जनकी उपलब्धि होती है।

भारतीय ज्योतिषके अनुसार बृहस्पतिकी प्रतिकूलतासे उत्पन्न होनेवाले अशुभ फल पीपलकी समिधासे हवन

करनेसे शान्त हो जाते हैं। अतः यज्ञमें पीपलकी समिधाको अति उपयोगी और महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

जन्मकुण्डलीमें प्रबल वैधव्ययोगवाली कन्या यदि अश्वत्थव्रतका श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करे, तो वह इससे मुक्त होकर अखण्ड सौभाग्यवती हो सकती है।

अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेदमें पीपलके औषधीय गुणोंपर विस्तारसे प्रकाश डाला गया है। कई असाध्य व्याधियोंके उपचारमें पीपलके विभिन्न अंग-उपांगोंका प्रयोग किया जाता है। पीपलसे बने औषधके सेवनसे अपने जीवनसे निराश रोगी स्वस्थ हो जाते हैं।

सुप्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराजमें अश्वत्थोपासना-प्रकरणमें पीपलकी महिमाका वर्णन करते हुए अथर्वण ऋषिने पिप्पलाद मुनिको बतलाया है कि प्राचीन कालमें दैत्योंके अत्याचारसे पीड़ित देवगण जब भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उन्होंने श्रीहरिसे अपने कष्टोंसे मुक्ति पानेका उपाय पूछा तो प्रभुने कहा- मैं अश्वत्थके रूपमें भूतलपर प्रत्यक्षतः विराजमान हूँ। आप सबको सभी प्रकारसे इस वृक्षकी अर्चना और अभ्यर्थना करनी चाहिये।

महर्षि शौनकजी ‘अश्वत्थोपनयन’ नामक व्रतके विधानमें उल्लेख करते हैं कि किसी शुभमुहूर्तमें पुरुषको पीपलके वृक्षका रोपण करके उसका आठ वर्षोंतक पुत्रवत् पालन-पोषण करना चाहिये। इसके पश्चात् उसका उपनयन संस्कार करके नित्य विधिवत् पूजन किया जाय तो अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है।

पीपलका वृक्ष लगानेवालेकी वंश-परम्परा कभी नष्ट नहीं होती है। पीपलकी सेवा और सुरक्षा करनेवालेके पितृगण नरकसे छूटकर सद्गतिको प्राप्त करते हैं। शास्त्रोंके अनुसार पीपलका वृक्ष लगानेसे अक्षय-पुण्यका लाभ होता है। पीपलके आरोपण एवं पालन करनेवालेको इस लोकमें सुख-सौभाग्य तथा मरणोपरान्त श्रीहरिकी निकटई कीता प्राप्त होती है। पीपलका पूजन करनेवालेको यमलोककी दारुण यातना नहीं अङ्क]

अश्वत्थका स्पर्श और शनिवार

अर्थात् महाभाग अश्वत्थ। आप सुन्दर तथा प्रियदर्शन हैं। मेरी अभिलाषाओंको पूर्ण करें, मेरे कामादि शत्रुओंका पराभव करें। मुझे दीर्घ आयु, सन्तान, धन-धान्य, सौभाग्य तथा सभी प्रकारका ऐश्वर्य प्रदान करें। देव! महावृक्ष ! मैं आपकी शरणमें हूँ।

इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक परिक्रमाके बाद पीपलकी जड़को स्पर्श करे। पीपलका स्पर्श केवल शनिवारको करना चाहिये।

सच्ची श्रद्धा हो तो निःसंदेह कल्पवृक्ष पीपल सभी अभीष्टोंको पूर्ण करनेवाला है। पीपलकी पूजा करनेसे

कोई भी ग्रहपीड़ा, पितृदोष, कालसर्पयोग, ग्रहयोग, विषयोग तथा ग्रहोंसे उत्पन्न दोषका निवारण हो जाता है। प्रातःकाल एक घंटेतक पीपलके नीचे बैठकर मन्त्रजप करना स्वास्थ्यके लिये भी लाभदायक है। पीपलवृक्ष एक घंटेमें १७०० ग्राम प्राणवायु प्रवाहित करता है। जन्मकुण्डलीमें ८ प्रतिशत कोई-न-कोई दोष जरूर होता है। उसमें पितृदोष अधिक होता है। उससे घबरानेकी आवश्यकता नहीं। पीपलकी पूजा करनेसे अच्छा फल प्राप्त होता है और भगवत्प्रीतिपूर्वक पूजन करनेसे विशेष अभ्युदय होता है।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै
(श्रीमती शान्तिजी गोस्वामी)

 

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