नीम
आंध्रप्रदेश का राजकीय पेड़
मध्य प्रदेश का निमाड़ क्षेत्र का नाम ही नीम की आड़ से पड़ा है। अर्थात निमाड में सर्वाधिक नीम के पेड़ है जो पतझड़ में भी हरा भरा रहकर सुकून की छांव देता है।निमाड की गर्मी बहुत प्रसिद्ध है 46/47/48 डिग्री पारा पहुंच जाया करता है।
भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत लोकप्रिय और सदाबहार औषधीय वृक्ष है, जिसे आयुर्वेद में “सर्व रोग निवारिणी” और संयुक्त राष्ट्र द्वारा “21वीं सदी का वृक्ष” घोषित किया गया है। इसका स्वाद कड़वा होता है, लेकिन इसके औषधीय गुण इंसानी स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं।
नीम के विभिन्न भागों के उपयोग और फायदों की पूरी जानकारी नीचे दी गई है
अनुसार, नीम में निम्नलिखित शक्तिशाली गुण पाए जाते हैं।
एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगलः यह हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस के विकास को रोकता ।
एंटी-इंफ्लेमेटरीः शरीर के भीतर और बाहर की सूजन को कम करने में सहायक है।
एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-वायरलः यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता है। को बढ़ाता है और वायरस से लड़ता है।
1. नीम की पत्तियां
त्वचा रोगः पत्तियों को पीसकर लगाने से दाद, खाज, खुजली और कील-मुंहासे ठीक होते हैं।
रक्त शोधनः सुबह खाली पेट इसकी कोमल पत्तियां चबाने से खून साफ होता है।
मधुमेह नियंत्रणः यह ब्लड शुगर के स्तर को प्रबंधित करने में मदद करती हैं।
डिटॉक्सीफिकेशनः पानी में पत्तियां उबालकर स्नान करने से शरीर का संक्रमण दूर होता है।
2. नीम की दातून और छाल
मौखिक स्वास्थ्यः इसकी पतली टहनी (दातून) से मसूड़े मजबूत होते हैं और दांतों के कीड़े व पायरिया की समस्या दूर होती है।
घाव भरनाः छाल का लेप पुराने घावों और फोड़े-फुंसियों को जल्दी
ठीक करता है।
3. नीम का तेल और निबोली
4. बालों के लिए: नीम का तेल सिर
की जूँ और डैंड्रफ (रूसी) को खत्म करता है।
बवासीरः इसके फल (निबोली) का सेवन बवासीर की बीमारी में राहत देता है।
कृषि और पर्यावरण में महत्व
जैविक कीटनाशकः नीम के अर्क का उपयोग फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए ‘हर्बल पेस्टीसाइड’ के रूप में होता है।
मिट्टी की उर्वरताः नीम की खली (Neem Cake) को यरिया के साथमिट्टी की उर्वरताः नीम की खली (Neem Cake) को यूरिया के साथ मिलाने पर नाइट्रोजन धीरे-धीरे रिलीज होती है, जिससे मिट्टी उपजाऊ बनती है।
मच्छरों से बचावः सूखी पत्तियों का धुआं करने से मच्छर और अन्य कीट भाग जाते हैं।
भारतीय मूल का एक पर्ण- पाती वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यानमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण और उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। इसका वानस्पतिक नाम Azadirachta indica है। नीम का वानस्पतिक नाम इसके संस्कृत भाषा के निंब से व्युत्पन्न है।
डा राम पाटीदार
कृषिभूषण
पर्यावरणविद्