एक सुंदर फूलों वाला वृक्ष है
कोविदार वृक्ष को प्राचीन अयोध्या का राजवृक्ष तथा राजचिह्न माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में इसका उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि अयोध्या की सेना और राजध्वज पर कोविदार का चिह्न अंकित रहता था। जब भरत श्रीराम को वापस लाने चित्रकूट गए, तब लक्ष्मण ने दूर से ध्वज पर बने कोविदार चिन्ह को देखकर अयोध्या की सेना को पहचान लिया था।
लेग्यूमिनोसी (Leguminosae) कुल और सीज़लपिनिआयडी (Caesalpinioideae) उपकुल के अंतर्गत बॉहिनिया प्रजाति की समान, परंतु किंचित् भिन्न, दो वृक्षजातियों को यह नाम दिया जाता है, जिन्हें बॉहिनिया वैरीगेटा (Bauhinia variegata) और बॉहिनिया परप्यूरिया (Bauhinia purpurea) कहते हैं। बॉहिनिया प्रजाति की वनस्पतियों में पत्र का अग्रभाग मध्य में इस तरह कटा या दबा हुआ होता है मानों दो पत्र जुड़े हुए हों। इसीलिए कचनार को युग्मपत्र भी कहा गया है।
बॉहिनिया वैरीगेटा में पत्र के दोनों खंड गोल अग्रभाग वाले और तिहाई या चौथाई दूरी तक पृथक, पत्रशिराएँ १३ से १५ तक, पुष्पकलिका का घेरा सपाट और पुष्प बड़े, मंद सौरभ वाले, श्वेत, गुलाबी अथवा नीलारुण वर्ण के होते हैं। एक पुष्पदल चित्रित मिश्रवर्ण का होता है। अत: पुष्पवर्ण के अनुसार इसके श्वेत और लाल दो भेद माने जा सकते हैं। बॉहिनिया परप्यूरिया में पत्रखंड अधिक दूर तक पृथक पत्रशिराएँ ९ से ११ तक, पुष्पकलिकाओं का घेरा उभरी हुई संधियों के कारण कोणयुक्त और पुष्प नीलारुण होते हैं।
संस्कृत साहित्य में दोनों जातियों के लिए ‘कांचनार’ और “कोविदार’ शब्द प्रयुक्त हुए हैं। किंतु कुछ परवर्ती निघुटुकारों के मतानुसार ये दोनों नाम भिन्न-भिन्न जातियों के हैं। अत: बॉहिनिया वैरीगेटा को कांचनार और बॉहिनिया परप्यूरिया को कोविदार मानना चाहिए। इस दूसरी जाति के लिए आदिवासी बोलचाल में, “कोइलार’ अथवा “कोइनार’ नाम प्रचलित हैं, जो निस्संदेह “कोविदार’ के ही अपभ्रंश प्रतीत होते हैं।
आयुर्वेदीय वाङ्मय में भी कोविदार और कांचनार का पार्थक्य स्पष्ट नहीं है। इसका कारण दोनों के गुणसादृश्य एवं रूपसादृश्य हो सकते हैं। चिकित्सा में इनके पुष्प तथा छाल का उपयोग होता है। कचनार कषाय, शीतवीर्य और कफ, पित्त, कृमि, कुष्ठ, गुदभ्रंश, गंडमाला एवं व्रण का नाश करनेवाला है। इसके पुष्प मधुर, ग्राही और रक्तपित्त, रक्तविकार, प्रदर, क्षय एवं खाँसी का नाश करते हैं। इसका प्रधान योग “कांचनारगुग्गुल’ है जो गंडमाला में उपयोगी होता है।[2] कोविदार की अविकसित पुष्पकलिकाओं का शाक भी बनाया जाता है, जिसमें हरे चने (होरहे) का योग बड़ा स्वादिष्ट होता है।[3]
कुछ लोगों के मत से कांचनार को ही ‘कर्णिकार’ भी मानना चाहिए। परंतु संभवत: यह मत ठीक नहीं है
डा राम पाटीदार
कृषिभूषण
पर्यावरणविद्