
स्वर्ण पलाश, पीला पलाश (Yellow Palash)
यह एक अत्यंत दुर्लभ और औषधीय रूप है जहां आम तौर पर जंगलों में लाल रंग के पलाश (जंगल की आग या टेसू) बहुतायत में पाए जाते हैं, वहीं लाखों पेड़ों में से मुश्किल से एक या दो पेड़ ही पीले पलाश के देखने को मिलते हैं।
बसंत ऋतु (मार्च के महीने) में जब इस पर सुनहरे पीले रंग के फूल खिलते हैं, तो पूरा पेड़ सोने की तरह चमक उठता है।
इसके बारे में मुख्य महत्वपूर्ण बातें
पहचान और विशेषताएं
फूलों का रंगः इसके फूल चमकीले सुनहरे पीले रंग के होते हैं, जिनकी कलियां हाथीदांत जैसी दिखती हैं।
पत्तियां और बनावटः इसकी पत्तियां भी सामान्य पलाश की तरह तीन के समूह में होती हैं। पेड़ का तना टेढ़ा-मेढ़ा और शाखाएं राख के रंग जैसी होती हैं।
क्षेत्रः भारत में यह मुख्य रूप से राजस्थान के दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी अरावली क्षेत्रों (जैसे उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा) और मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के कुछ जंगलों में पाया जाता है।
महत्व और लाभ
धार्मिक और वास्तु महत्वः वास्तु शास्त्र के अनुसार पीले पलाश को घर या आसपास लगाना बेहद शुभमाना जाता है। माना जाता है कि इसमें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वास होता है।
औषधीय गुणः
आयुर्वेद में इसके फूल, छाल और बीजों का उपयोग पेट के कीड़े (कृमि नाशक), त्वचा रोग, पाचन संबंधी समस्याओं और मधुमेह (डायबिटीज) को नियंत्रित करने वाली दवाएं बनाने में किया जाता है।
प्राकृतिक रंगः होली के त्योहार पर इसके फूलों को पानी में उबालकर पूरी तरह केमिकल-मुक्त, त्वचा के लिए सुरक्षित प्राकृतिक पीला रंग बनाया जाता है।
अन्य उपयोगः इसके पत्तों से पारंपरिक पत्तल और दोने बनाए जाते हैं।
यह दुर्लभ क्यों है?
पीले पलाश के विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने के मुख्य कारण इसके बीजों का कमजोर अंकुरण होना, आनुवंशिक म्यूटेशन (Genetic Mutation) और किसानों द्वारा जानकारी के अभाव में खेतों की मेढ़ों से इन्हें काट दिया जाना है। आज के समय में पर्यावरण प्रेमी इसके नए पौधे तैयार करके इसे सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।


