- अग्रेजी नाम: Banyan Tree
- वा. नाम : Ficus bengalensis
- फूल एवं फल आने का समय : वर्ष भर
- बीज संग्रहण : वार्षिक
- उपयोग : पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व औषधियों में बहुत व्यापक उपयोग।
- उपलब्धता – व्यापक।
यह एक बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। इसे ‘वट’ और ‘बड़’ भी कहते हैं। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए धरती के भीतर घुस जाती हैं एंव स्तम्भ बन जाती हैं। इन जड़ों को ‘बरोह’ या ‘प्राप जड़’ कहते हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एवं लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ी, एंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्ती, शाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स अम्ल कहा जाता है।
विशाल फैलावः इसकी शाखाएं लम्बवत बढ़ने के बजाय क्षैतिज (चौड़ाई में) फैलती हैं। भारत के पश्चिम बंगाल (हावड़ा) में स्थित The Great Banyan Tree दुनिया के सबसे चौड़े पेड़ों में से एक है।
धार्मिक महत्व
त्रिमूर्ति का वासः हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष में देवों का वास होता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, छाल में विष्णु और शाखाओं में शिव निवास करते हैं।
वट सावित्री व्रतः सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए वट सावित्री के दिन इस वृक्ष की विशेष पूजा और परिक्रमा करती हैं।
कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर में भगवान कृष्ण ने इसी वृक्ष के नीचे अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।
पर्यावरणीय महत्व
ऑक्सीजन का बड़ा स्रोतः यह वृक्ष दिन में 20 घंटे से अधिक समय तक भारी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है।
प्रदूषण नियंत्रणः इसकी घनी और चौड़ी पत्तियां हवा में मौजूद धूल-कणों को रोककर वायु प्रदूषण को कम करती हैं।
मिट्टी का संरक्षणः इसकी फैली हुई जड़ें मिट्टी को मजबूती से जकड़े रखती हैं, जिससे भूमि का कटाव (मृदा अपरदन) रुकता है।
पारिस्थितिक तंत्रः यह पेड़ सालों भर फल देने के कारण सैकड़ों जीवो का पोषण करता है।
आयुवेदिक एवं औषधीय गुण
आयुर्वेद चिकित्सा में वट वृक्ष के हर हिस्से (छाल, पत्ते, जड़ और दूध) का उपयोग किया जाता हैं।
दांतों के लिएः इसकी टहनी से दातून करने पर मसूड़े मजबूत होते हैं और दांतों का दर्द दूर होता है।
त्वचा और घावः इसके पत्तों से निकलने वाला दूध सूजन, मोच और फटी एड़ियों को ठीक करने में मददगार होता है।
पेट के रोगः इसकी छाल और जड़ का काढ़ा दस्त (लूज मोशन) और पेट के उपचार में उपयोगी है।
– डा. राम पाटीदार
कृषिभूषण
पर्यावरणविद्
यदि भारतीय गाँवों के इतिहास को देखा जाए तो बरगद केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र रहा है।
इसकी घनी छाया के नीचे ग्राम सभाएँ आयोजित होती थीं, पंचायती निर्णय लिए जाते थे और समाज के सुख-दुख साझा किए जाते थे। अनेक स्थानों पर बरगद का वृक्ष आज भी ग्रामीण जीवन की पहचान बना हुआ है। इसकी छाया में बैठकर लोग संवाद करते हैं, विचार-विमर्श करते हैं और सामुदायिक जीवन को मजबूत बनाते हैं। इस दृष्टि से वट वृक्ष सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का भी प्रतीक है। पर्यावरणीय दृष्टि से वट वृक्ष का महत्व अत्यंत व्यापक है। इसकी विशाल छत्राकार संरचना बड़ी मात्रा में कार्यन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर बातावरण को शुद्ध करती है। इसकी जटाएँ मिट्टी को बाँधे रखती हैं और भूमि क्षरण को रोकती हैं। बरगद की शाखाएँ और पत्तियाँ अनेक पक्षियों, गिलहरियों, बंदरों तथा अन्य जीवों को आश्रय प्रदान करती हैं। एक परिपक्व वट वृक्ष अपने आप में एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर देता है, जहाँ जीवन की अनेक धाराएँ एक साथ विकसित होती हैं। यही कारण है कि पर्यावरणविद इसे जैव विविधता का प्राकृतिक संरक्षक मानते हैं।
आयुर्वेद में भी वट वृक्ष का विशेष महत्व बताया गया है। इसकी छाल, पत्तियाँ, जटाएँ और फल विभिन्न औषधीय गुणों से युक्त माने गए हैं। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका उपयोग मधुमेह नियंत्रण, घावों के उपचार, त्वचा संबंधी समस्याओं तथा पाचन संबंधी विकारों में किया जाता रहा है।
भारतीय संस्कृति में कुछ वृक्ष केवल वनस्पति नहीं होते, वे जीवन-दर्शन, परंपरा और प्रकृति के प्रति हमारी संवेदनशीलता के प्रतीक बन जाते हैं। वट वृक्ष, जिसे बरगद भी कहा जाता है, ऐसा ही एक वृक्ष है। अपनी विशालता, दीपासुं और अनगिनत जटाओं के कारण यह भारतीय जनमानस में विशेष स्थान रखता है। यही कारण है कि इसे भारत का राष्ट्रीय वृक्ष तथा मध्यप्रदेश का राजकीय वृक्ष होने का गौरव प्राप्त है। सदियों से यह वृक्ष मानव सभ्यता को छाया, आश्रय, प्रेरणा और जीवन का संदेश देता आया है।
भारतीय धर्मग्रंथों और पुराणों में बट वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना गया है। इसे अक्षय वट भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ऐसा वृक्ष जिसका अस्तित्व और महत्त्व कभी समाप्त नहीं होता। मान्यता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास होता है। इस प्रकार वट वृक्ष सृष्टि, पालन और संहार की त्रिदेव शक्ति का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि भारत के अनेक तीर्थस्थलों और मंदिरों के आसपास वट वृक्ष विशेष रूप से लगाए जाते रहे हैं।
वट वृक्ष से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा सावित्री और सत्यवान की है। पौराणिक मान्यता के अनुसार सत्यवान की मृत्यु वट वृक्ष के नीचे हुई थी। जब यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री वट वृक्ष : हमारी संस्कृति, आस्था और प्रकृति का अक्षय प्रहरी ने अपनी अटूट निष्ठा, साहस और बुद्धिमत्ता से उन्हें प्रसन्न कर लिया। अंततः यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान किया। तभी से वट वृक्ष अखंड सौभाग्य, समर्पण और जीवन की निरंतरता का प्रतीक बन गया। आज भी वट सावित्री व्रत के अवसर पर महिलाएँ, वट वृक्ष की पूजा कर परिवार के सुख और समृद्धि की कामन्य करती हैं। यदि भारतीय गाँवों के इतिहास को देखा जाए तो बरगद केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का केंद्र रहा है। इसकी घनी छाया के नीचे ग्राम सभाएँ आयोजित होती थीं, पंचायती निर्णय लिए जाते थे और समाज के सुख-दुख साझा किए जाते थे। अनेक स्थानों पर बरगद का वृक्ष आज भी ग्रामीण जीवन की पहचान बना हुआ है। इसकी छाया में बैठकर लोग संवाद करते हैं, विचार-विमर्श करते हैं और सामुदायिक जीवन को मजबूत बनाते हैं। इस दृष्टि से वट वृक्ष सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का भी प्रतीक है। पर्यावरणीय दृष्टि से वट वृक्ष का महत्व अत्यंत व्यापक है। इसकी विशाल छत्राकार संरचना बड़ी मात्रा में कार्यन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण को शुद्ध करती हैं।
– डॉ. स्वप्निल व्यास
पर्यावरणविद्
कुछ अन्य पौराणिक वटवृक्ष
वाराणसीका अक्षयवट –
वाराणसीमें श्रीविश्वनाथ मन्दिरके द्वारसे निकलकर दुण्डिराज गणेशकी ओर चलें तो प्रथम बायीं ओर शनैश्चरका मन्दिर मिलता है। इनका मुख चाँदीका है, शरीर नहीं है। नीचे केवल कपड़ा पहिनाया होता है। पास एक ओर महावीरजी हैं। एक कोनेमें वटवृक्ष था, जिसे अक्षयवट कहते थे। यहाँ द्रौपदादित्य तथा नकुलेश्वर महादेव हैं। वर्तमानमें ये सब श्रीकाशीविश्वनाथधाम (कॉरीडोर) के अन्तर्गत आ गये हैं। नवनिर्मित कॉरीडोरमें २०२१ई० में निर्माणकार्यके समय असावधानीवश क्षतिग्रस्त होकर अक्षयवट अब स्मृतिशेष ही रह गया है।
वाराणसीका कांचनशाख वटवृक्ष –
वाराणसी में मीरघाटके निकट धर्मकूपके पास कांचनशाख नामक प्राचीन काशीखण्डोक्त वटवृक्ष स्थित है। (का०ख० ७८।१३, २३-२५)
गयाका अक्षयवट –
ब्रह्मसरोवरके पास ही अक्षयवट है। चहारदीवारीसे घिरा विस्तृत पक्का आँगन है, जिसके मध्य वटवृक्ष है। इसके उत्तर वटेश्वर महादेवका मन्दिर है। अक्षयवटसे पश्चिम रुक्मिणी-सरोवर और अक्षयवटके उत्तर वृद्धप्रपितामहेश्वरका मन्दिर है। अक्षयवटके दक्षिण गदालोल नामक सरोवर है। सरोवरमें एक स्तम्भके रूपमें गदा है। कहते हैं कि असुरको मारकर भगवान्ने
यहाँ गदा धोयी थी।
उज्जैनका सिद्धवट –
उज्जैनमें कालभैरवके पूर्व शिप्रा नदीके दूसरे किनारे सिद्धवट है। वैशाखमें यहाँकी यात्रा होती है। इस वटवृक्षके नीचे नागबलि, नारायणबलि, कालसर्पशान्ति, भौमशान्ति, शनिशान्ति आदि कार्योंका माहात्म्य माना गया है।
सोरों (शूकर-क्षेत्र) का सिद्धवट –
उत्तर-प्रदेशके एटा जिलेमें कासगंजके पास सोरों (शूकर-क्षेत्र) है। वाराहक्षेत्रके नामसे भारतमें कई स्थान कहे जाते हैं, उनमेंसे एक स्थान सोरों है। यहाँ चार वटोंमें गृद्धवट है। उसके नीचे वटुकनाथ मन्दिर है।
कुरुक्षेत्रका गीतोपदेशसाक्षी अक्षयवट तथा कुछ अन्य प्राचीन वटवृक्ष –
कुरुक्षेत्रकी भूमिमें श्रीमद्भगवद्गीताकी जन्मभूमि ज्योतिसर अति ही पवित्र स्थान है। इसी स्थानपर महाभारतकी प्रसिद्ध लड़ाईके समय वीर अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णने गीतारूपी अमृतका पान कराया था, महाराज हर्षके समयमें यह स्थान उनकी राजधानीमें ही सम्मिलित था। यह वर्तमान थानेसर शहरसे लगभग ५ कि०मी० पश्चिमकी ओर कुरुक्षेत्रसे पेहोवा जानेवाली पक्की सड़कपर है। तीर्थकी उत्तर दिशामें इसी नामका एक ग्राम भी बसा हुआ है। पतितपावनी सरस्वतीनदी इसके समीप होकर बहती है।
इस स्थानपर एक अति प्राचीन सरोवर तथा कुछ प्राचीन वट वृक्षोंके अतिरिक्त अन्य कोई विशेष प्राचीन स्मारक नहीं है। सरोवर ‘ज्योतिसर’ अर्थात् ‘ज्ञानका स्त्रोत ‘के नामसे प्रसिद्ध है। सरोवरतटपर खड़े हुए प्राचीन वट वृक्षोंमेंसे एक वट वृक्ष अति पवित्र माना जाता है। वह ‘अक्षय वट वृक्ष’ के नामसे विख्यात है, जो भगवान् श्रीकृष्णके गीता उपदेशकी घटनाका एकमात्र साक्षी माना जाता है। एक अन्य वट वृक्ष एक प्राचीन शिवमन्दिरके भग्नावशेषपर खड़ा हुआ है। (अधिक सम्भव है कि यह शिव मन्दिर थानेसर-विध्वंसके समय ही मुसलमानोंकी ध्वंसवृत्तिका शिकार बना हो।) लगभग २०० वर्ष पहले इस भग्नावशेषके समीप कश्मीरके एक राजाने एक नये शिव मन्दिरका निर्माण करवाया था तथा एक दूसरा मन्दिर लगभग १०० साल पहलेका बना हुआ है। सन् १९२४ ई०में स्व० महाराज दरभंगाने अक्षय वट-वृक्षके चारों ओरके चबूतरेको पुनः निर्माण करवाकर पक्का बनवाया तथा भगवान् श्रीकृष्णका एक छोटा मन्दिर बनवाया। यहाँका पवित्र सरोवर अत्यन्त विशाल (लगभग १००००५००) है। इसके उत्तरी तटपर शिवालय है तथा अक्षय वट वृक्ष है तथा दक्षिणी तटसे पेहोवा जानेवाली सड़क गुजरती है। सरोवरके उत्तरी तथा पूर्वी तटोंपर सुन्दर पक्के घाट बने हुए हैं।
पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाध्यै नमोऽस्तु ते ॥’ इस मन्त्रसे सावित्रीको अर्घ्य देना चाहिये और वटवृक्षका सिंचन करते हुए निम्न प्रार्थना करनी चाहिये-
वट सिञ्चामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः। यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले । तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा ॥ चनेपर रुपया रखकर बायनेके रूपमें अपनी सासको देकर आशीर्वाद लिया जाता है। सौभाग्यपिटारी और पूजा सामग्री किसी योग्य ब्राह्मणको दी जाती है। सिन्दूर, दर्पण, मौली (नाल), काजल, मेंहदी, चूड़ी, माधेकी बिन्दी, हिंगुल, साड़ी, स्वर्णाभूषण इत्यादि वस्तुएँ एक बाँसकी टोकरीमें रखकर दी जाती हैं- यही सौभाग्य-पिटारीके नामसे जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियोंका भी पूजन होता है। कुछ महिलाएँ केवल अमावास्याको एक दिनका ही व्रत रखती हैं। इस व्रतमें सावित्री-सत्यवान्की पुण्य कथाका श्रवण करती हैं। वटसावित्री व्रतकी कथा इस प्रकार है-
एक समयकी बात है, मद्रदेशमें अश्वपति नामक महान् प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनके कोई सन्तान नहीं थी। पण्डितोंके कथनानुसार राजाने सन्तानहेतु यज्ञ करवाया। उसीके प्रतापसे कुछ समय बाद उन्हें कन्याकी प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। समय बीतता गया। कन्या बड़ी होने लगी। जब सावित्रीको स्वयंके लिये वर खोजनेके लिये कहा गया तो उसने द्युमत्सेनके पुत्र सत्यवान्का यश सुनकर उन्हें पतिरूपमें वरण कर लिया।
इधर यह बात जब नारदजीको मालूम हुई तो वे राजा अश्वपतिके पास आकर बोले कि आपकी कन्याने वर खोजनेमें बड़ी भारी भूल की है। सत्यवान् गुणवान् तथा धर्मात्मा अवश्य है, परंतु वह अल्पायु है। एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जायगी।
नारदजीकी बात सुनकर राजा उदास हो गये। उन्होंने अपनी पुत्री को समझाया-‘पुत्रि। ऐसे अल्पायु व्यक्तिसे विवाह करना उचित नहीं है, इसलिये तुम कोई और वर चुन लो।’ इसपर सावित्री बोली- ‘तात! आर्य कन्याएँ अपने पतिका वरण एक ही बार करती हैं, अतः ३. देशभेद, कालभेद एवं आवारभेदसे वटसावित्रीके अनेक रूप हैं।
अब चाहे जो हो, मैं सत्यवान्को ही वरके रूपमें स्वीकार करूँगी।’
सावित्रीके दृढ़ रहनेपर आखिर राजा अश्वपति विवाहका सारा सामान और कन्याको लेकर वृद्ध सचिवसहित उस वनमें गये, जहाँ राजश्रीसे भ्रष्ट, अपनी रानी और राजकुमारसहित एक वृक्षके नीचे अन्धे द्युमत्सेन रहते थे। विधि-विधानपूर्वक सावित्री और सत्यवान्का विवाह कर दिया गया।
वनमें रहते हुए सावित्री सास-ससुर और पतिकी सेवामें लगी रही। नारदजीके बतलाये अनुसार पतिके मरणकालका समय पास आया तो वह उपवास करने लगी। नारदजीने जो पतिकी मृत्युका दिन बतलाया था, उस दिन जब सत्यवान् कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटनेके लिये वनमें जानेको तैयार हुआ, तब सावित्री भी अपने सास-ससुरसे आज्ञा लेकर उसके साथ वनको चली गयी।
वनमें सत्यवान् ज्यों ही पेड़पर चढ़ने लगा, उसके सिरमें असह्य पीड़ा होने लगी। वह सावित्रीकी गोदमें अपना सिर रखकर लेट गया। थोड़ी देर बाद सावित्रीने देखा कि अनेक दूतोंके साथ हाथमें पाश लिये यमराज खड़े हैं। यमराज सत्यवान्के अंगुष्ठप्रमाण जीवको लेकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। सावित्री भी यमराजके पीछे-पीछे चली। सावित्रीको आते देख यमराजने कहा-‘हे पतिपरायणे! जहाँतक मनुष्य मनुष्यका साथ दे सकता है, वहाँतक तुमने अपने पतिका साथ दे दिया। अब तुम वापस लौट जाओ।’
यह सुनकर सावित्री बोली- ‘जहाँतक मेरे पति जायेंगे, वहाँतक मुझे जाना चाहिये। यही सनातन सत्य है।’
यमराजने सावित्रीकी धर्मपरायण वाणी सुनकर वर माँगनेको कहा। सावित्रीने कहा- ‘मेरे सास-ससुर अन्धे हैं, उन्हें दिव्य ज्योति दें’। यमराजने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जानेको कहा, किंतु सावित्री उसी प्रकार यमके पीछे-पीछे चलती रही। यमराजने उससे पुनः वर माँगनेको कहा। सावित्रीने वर माँगा कि ‘मेरे ससुरका खोया राज्य उन्हें वापस मिल जाय।’ यमराजने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जानेको कहा, परंतु सावित्री अडिग रही।
सावित्रीकी पति-भक्ति और निष्ठा देखकर यमराज अत्यन्त द्रवीभूत हो गये। उन्होंने सावित्रीसे एक और वर माँगनेके लिये कहा। तब सावित्रीने यह वर माँगा कि ‘मैं सत्यवान्के सौ पुत्रोंकी माँ बनना चाहती हूँ। कृपाकर आप मुझे यह वरदान दें।’ सावित्रीकी पतिभक्ति आदिसे प्रसन्न हो इस अन्तिम वरदानको देते हुए यमराजने सत्यवान्को अपने पाशसे मुक्त कर दिया और वे अदृश्य हो गये। सावित्री अब उसी वट वृक्षके पास आयी। वट-वृक्षके नीचे पड़े सत्यवान्के मृत शरीरमें जीवका
संचार हुआ और वह उठकर बैठ गया।
सत्यवान्के माता-पिताकी आँखें ठीक हो गयीं और उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया। इससे सावित्रीके अनुपम व्रतकी कीर्ति सारे देशमें फैल गयी।
इस प्रकार यह मान्यता स्थापित हुई कि सावित्रीकी इस पुण्य कथाको सुननेपर तथा पति-भक्ति रखनेपर महिलाओंके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे और सारी विपत्तियाँ दूर होंगी। प्रत्येक सौभाग्यवती नारीको यह वट-सावित्रीका व्रत रखकर यह कथा सुननी चाहिये।
पुरुषोत्तमक्षेत्रस्थित अक्षय वटवृक्षका माहात्म्य
नारदपुराण के उत्तरभागमें पुरोहित वसु मोहिनीसे पुरुषोतमक्षेत्र में समुद्रतटके समीप ही स्थित प्रधान तोर्थोंका वर्णन करते हुए कहते हैं- वहाँ कल्पवृक्ष नामक बट बड़ा रमणीय है। उसके ऊपर साक्षात् भगवान् बालमुकुन्द विराजते हैं। वहाँ स्नान करके एकाग्रचित्तसे तीन बार भगवान्की परिक्रमा करे। मोहिनी! उनके दर्शनसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है और प्रचुर पुण्य तथा अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है। अब मैं उन वटस्वरूप भगवान्के प्रत्येक युगके अनुसार प्रामाणिक नाम बतलाऊँगा। वट, वटेश्वर, कृष्ण तथा पुराणपुरुष-वे सत्य आदि युगोंमें क्रमशः वटके नाम कहे गये हैं। इसी प्रकार सत्ययुगमें वटका विस्तार एक योजन, त्रेतामें पौन योजन, द्वापरमें आधा योजन और कलियुगमें चौथाई योजनका माना गया है। कल्पान्तस्थायी वटवृक्षके पास जाकर उसकी तीन बार परिक्रमा करे; फिर निम्नांकित मन्त्रद्वारा बड़े भक्तिभावके साथ उस वटकी पूजा करे-
ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महते नतपालिने। महोदकोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते ॥ अवसस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट। न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते ॥
(ना० उत्तर० ५५।२४-२५)
‘जो अव्यक्तस्वरूप, महान् एवं प्रणतजनोंका पालक है, महान् एकार्णवके जलमें जिसकी स्थिति है, उस वटवृक्षको नमस्कार है। हे वट! आप प्रत्येक कल्पमें अक्षयरूपसे निवास करते हैं। आपकी शाखापर श्रीहरिका निवास है। न्यग्रोध! मेरे पाप हर लीजिये। कल्पवृक्ष! आपको नमस्कार है।’
इसके बाद भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके उस कल्पान्तस्थायी वटवृक्षको नमस्कार करना चाहिये। उस कल्पवृक्षकी छायामें पहुँच जानेपर मनुष्य ब्रह्महत्यासे भी मुक्त हो जाता है, फिर अन्य पापोंकी तो बात ही क्या है? ब्रह्मपुत्री! भगवान् श्रीकृष्णके अंगसे प्रकट हुए ब्रह्मतेजोमय वटवृक्षरूपी विष्णुको प्रणाम करके मानव राजसूय तथा अश्वमेधयज्ञसे भी अधिक फल पाता है और अपने कुलका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है।
जो वटवृक्ष और गरुड़जीका दर्शन करनेके पश्चात् पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
[श्रीनारदपुराण, उत्तरभाग अ० ५५। ३१]
* पहले यहाँ नीलाचल नामक पर्वत था और उसपर नीलमाधव भगवान्की श्रीमूर्ति थी, जिसकी देवता आराधना करते थे। वह पर्वत भूमिमें चला गया और भगवान्की वह मूर्ति देवता अपने लोकमें ले गये; किंतु इस क्षेत्रको उन्होंकी स्मृतिमें अब भी नीलाचल कहते हैं। श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके शिखरपर लगा चक्र ‘नीलच्छत्र’ कहा जाता है। उस नीलच्छत्रके दर्शन जहाँतक होते हैं, वह पूरा क्षेत्र श्रीजगन्नाथपुरी है। इस क्षेत्रके अन्य अनेक नाम हैं- श्रीक्षेत्र, पुरुषोत्तमपुरी तथा शङ्खक्षेत्र। श्रीजगन्नाथजीके मन्दिरके दूसरे प्राकारके भीतर जानेसे पूर्व २५ सौदी चढ़ना पड़ता है। इन सीढ़ियोंको प्रकृतिके २५ विभागोंका प्रतीक माना गया है। द्वितीय प्राकारके द्वारमें प्रवेश करनेके पूर्व दोनों ओर भगवत्प्रसादका बाजार दिखायी देता है। आगे अजाननाथ गणेश; बटेरा महादेव एवं पटमंगलादेवीके स्थान हैं। सत्यनारायणभगवान् हैं। इसी और आगे वटवृक्ष है, जिसे कल्पवृक्ष कहते हैं। उसके नीचे बालमुकुन्द (वटपत्रशायी) के दर्शन हैं। वटवृक्षकी परिक्रमा की जाती है।
प्रलयका साक्षी- वटवृक्ष
भारतीय संस्कृतिमें जिन विश्वोपकारक वृक्षोंको साक्षात् देवता मानकर उनका रक्षण एवं अर्चन किया जाता है, उनमें वटवृक्ष भी परिगणित है। यह अपने मूलसे अन्य वृक्षोंको भी आवेष्टित कर लेता है, इसलिये इसे ‘वट’ कहते हैं-वटति वेष्टयति मूलेन वृक्षान्तरमिति। भावप्रकाश आदि चिकित्साग्रन्थोंमें इसके अनेक नाम मिलते हैं, जो इसकी विशेषताओंको प्रकाशित करते हैं। वटके प्रमुख नामोंमें न्यग्रोध, बहुपात्, क्षीरी, यक्षावास, पादरोहण, यमप्रिय, जटाल और भाण्डीर हैं। इसकी जटाओं तथा मूलकी बहुलताके कारण यह बहुपात् तथा जटाल है। रोहणके कारण न्यग्रोध कहलाता है। इसके पत्र, डाली आदिके टूटनेपर दुग्ध निकलनेके कारण इसे क्षीरी कहा जाता है। यक्ष, यक्षराज, कुबेर, यमदेव तथा शिवसे इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है। यक्षोंका आवास वृक्ष होनेसे इसे यक्षावास कहते हैं। अंग्रेजीमें इसे बेनियन ट्री (Banyan Tree) कहते हैं।
पुराणोंक अनुसार प्रलयकालमें जब समस्त स्थावर जंगम जगत् अपने कारणमें लीन हो जाता है, उस समय उस कारणवारिमें महाकारणस्वरूप भगवान् श्रीहरि इसी वृक्षके पत्रपुटक अथवा वृक्षगत दिव्यपर्यंकमें विराजते हैं-वटस्य पत्रस्य पुढे शयानम् ।
श्रीमद्भागवतके अनुसार मायिक प्रलयके साक्षी महर्षि मार्कण्डेयका कुछ ऐसा ही अनुभव है-
स कदाचिद् भ्रमँस्तस्मिन् पृथिव्याः ककुदि द्विजः।
न्यग्रोधपोतं ददृशे फलपल्लवशोभितम् ॥
प्रागुत्तरस्यां शाखायां तस्यापि ददृशे शिशुम्।
शयानं पर्णपुटके ग्रसन्तं प्रभया तमः ॥
(१२/९/२०-२१)
विष्णुधर्मोत्तरमें वटवृक्षके ऊपर पर्यककारूढ़ श्रीहरिका दर्शन वर्णित है-
पश्यामि जलमध्यस्थं विपुले वटपादयम्।
पर्वके तत्र पश्यामि बालं कमललोचनम्॥
अस्तु। जो कुछ भी हो, किंतु इतना अवश्य ही सत्य
है कि यह वटवृक्ष कारणार्णवविहारी महाकारण नारायणका आश्रयस्थल बनता है। भगवान् शंकरकी दीर्घ समाधिदशा भी इसी वृक्षके तले सम्पन्न होती है- बैठे बट तर करि कमलासन। और यही पुण्यतरु कल्पान्तजीवी काकभुशुण्डिजीका कथामण्डप भी बनता है- ‘बर तर कह हरि कथा प्रसंगा जहाँ विष्णुवाहन गरुड्जीने ‘बट तर गयउ हृदय हरषाना’ जाकर लीलाकथामृत तो पिया ही था, स्वयं समस्त विद्याओंके परमाचार्य भगवान् महेश्वरने भी कभी हंस बनकर रामकथारूपी मानसरोवरके मोती चुगे थे- ‘तब कछु काल मराल तनु धरि तह कीन्ह निवास। ‘भारतीय इतिहासमें जब-जब पतिव्रतकी परिसीमा राजवधू सावित्रीका नाम लिया जाता है, तो वटकी स्मृति अनायास ही हो आती है, जिसके नीचे अल्पायु सत्यवान्को यमदेवने दीर्घायु बना दिया था। भगवान् बुद्धने भले ही अश्वत्थके नीचे बोधिलाभ किया हो, किंतु उनके प्रिय स्थानोंमें वट एवं वटवनका विशेष परिगणन है। बोधिलाभके अनन्तर जब वे अपने पिता और पुत्रसे मिलकर सारी ममता छोड़कर आगे बढ़े तो न्यग्रोधवनने ही उनका अभिनन्दन किया था-
विलपन्तीषु नारीषु तासु चैवं त्वसौ पुनः।
लब्धभिक्षस्त्वनासक्तो
न्यग्रोधवनमाययौ ।।
(बुद्ध० १९।५८)
इस प्रकार ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आगमिक (यक्षादिसम्बन्धी मन्त्रसाधनाओंमें इसे विशेष महत्त्वपूर्ण माना गया है।) दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण यह वृक्ष चिकित्सा और पर्यावरणकी दृष्टिसे भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसकी जड़ें भूतलमें दूर-दूरतक फैलकर मृदाक्षरणको रोकती हैं। इसका विशाल आच्छादन वायुमण्डलको प्रदूषणमुक्त करनेमें विशेष सहयोग करता है। इसके पत्तोंकी संरचना, आकार आदि वायुमें संक्रान्त धूलिकणोंको दूरकर वायुको निर्मल बनाते हैं। इन प्रदूषणरोधी गुणोंके कारण मार्ग एवं औद्योगिक क्षेत्रोंमें इसका रोपण विशेष उपयोगी है। इसके प्रचुर पत्र भूतल पर गिरकर वहाँकी भूमिको उपजाऊ बनाते हैं।
(डॉ० श्रीश्रीनिवासी पाण्डेय)